भस्त्रिका प्राणायाम
!!!--: भस्त्रिका प्राणायाम :---!!!
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लेखक :---- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री Yog
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किसी ध्यान उपयोगी आसन में सुविधा अनुसार बैठकर दोनों नासिका से श्वास को पूरा अंदर डायाफ्राम तक भरना तथा बाहर सहजता के साथ छोड़ना "भस्त्रिका प्राणायाम" कहलाता है । लेखक :---- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री
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भस्त्रिका प्राणायाम में श्वास को अंदर भरते हुए मन में विचार (संकल्प) करना चाहिए कि ब्रह्माण्ड में विद्यमान दिव्य शक्ति, ऊर्जा, पवित्रता, शान्ति और आनन्द आदि जो भी शुभ है, वह प्राण के साथ मेरे देह में प्रविष्ट हो रहा है । मैं दिव्य शक्तियों से ओत-प्रोत हो रहा हूं । इस प्रकार दिव्य सङ्कल्प के साथ किया हुआ प्राणायाम विशेष लाभप्रद होता है । लेखक :---योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री
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ढाई सेकेंड में श्वास अंदर लेना एवं ढाई सेकेंड में श्वास को एक लय के साथ बाहर छोड़ना । इस प्रकार बिना रुके एक मिनट में 12 बार भस्त्रिका प्राणायाम होगा । एक आवृत्ति में पांच मिनट करना होगा । प्रारंभ में थोड़ा रुकना पड़ सकता है । लगभग एक सप्ताह में निरन्तर पांच मिनट बिना व्यवधान के अभ्यास हो जाता है । लेखक :---- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री
स्वस्थ एवं सामान्यतया रोग ग्रस्त व्यक्तियों को प्रतिदिन 5 मिनट भस्त्रिका का अभ्यास अवश्य करना चाहिए । कैंसर लंग फाइब्रोसिस, मस्क्युलर डिस्ट्रॉफी, एम एस., एस एल. ई. एवं अन्य असाध्य रोगों में 10 मिनट तक अभ्यास करना चाहिए ।भस्त्रिका 1 मिनट में 12 बार इसी प्रकार 5 मिनट में 60 बार अभ्यास हो जाता है । कैंसर आदि असाध्य रोगों में दो आवृत्ति करने पर 120 बार प्राणायाम होता है । सामान्यतः प्राणायाम खाली पेट किया जाए तो उत्तम है । किसी कारणवश प्रातः प्राणायाम नहीं कर पाए तो दोपहर के खाने के 5 घंटे बाद भी प्राणायाम किया जा सकता है । असाध्य रोगी प्रातः सायं दोनों समय प्राणायाम करें तो शीघ्र ही अधिक लाभ होगा । लेखक :---- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री
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(१.) जिनको उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोग हो, उन्हें तीव्र गति से भस्त्रिका नहीं करनी चाहिए ।
(२.) इस प्राणायाम को करते समय जब श्वास को अंदर भरे तक पेट नहीं फुलाना चाहिए । स्वास डायाफ्राम तक भरे, इससे पेट नहीं फूलेगा । पसलियों तक छाती ही फूलेगी ।डायाफ्रैग्मेटिक डीप ब्रीदिंग का नाम ही भस्त्रिका है ।
(३.) ग्रीष्म ऋतु में यह प्राणायाम धीमी गति से करें ।
(४.) कफ की अधिकता या साइनस आदि रोगों के कारण जिनके दोनों नासाछिद्र ठीक से खुले हुए नहीं होते, उन लोगों को पहले दाएं स्वर को बंद करके बायें से रेचक और पूरक करना चाहिए । फिर बाएं को बंद करके दाएं से यथाशक्ति मंद, मध्यम, या तीव्र गति से रेचक तथा पूरक करना चाहिए । फिर अंत में दोनों स्वरों इडा एवं पिंगला से रेचक, पूरक करते हुए भस्त्रिका प्राणायाम करें । इस प्राणायाम को 5 मिनट तक प्रतिदिन अवश्य करें । प्राणायाम की क्रियाओं को करते समय आंखों को बंद रखें और मन में प्रत्येक श्वास प्रश्वास के साथ ओ३म् मानसिक रूप से चिंतन और मनन करना चाहिए ।
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(१.) इस प्राणायाम से सर्दी, जुकाम, एलर्जी, श्वास रोग, दमा, पुराना नजला, साइनस आदि समस्त कफ रोग दूर होते हैं । फेफड़े सबल बनते हैं तथा हृदय और मस्तिष्क को भी शुद्ध प्राणवायु मिलने से आरोग्य लाभ होता है ।
(२.) थायराइड एवं टॉन्सिल आदि गले के समस्त रोग दूर होते हैं ।
(३.) त्रिदोष सम होते हैं । रक्त परिशुद्ध होता है तथा शरीर के विषाक्त, विजातीय द्रव्यों का निष्कासन होता है ।
(४.) प्राण और मन से होते हैं । यह प्राण उत्थान और कुंडलिनी जागरण में सहायक है ।
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