योग का स्वरूप
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संकलनकर्त्ता :---- योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री
योग शब्द वेदों, उपनिषदों, गीता एवं पुराणों आदि में अति पुरातन काल से व्यवहृत होता आया है । भारतीय दर्शन में योग एक अति महत्वपूर्ण शब्द है । आत्म दर्शन एवं समाधि से लेकर कर्मक्षेत्र तक के लिए योग का व्यापक व्यवहार हमारे शास्त्रों में हुआ है । योगदर्शन के उपदेष्टा महर्षि पतंजलि योग शब्द का अर्थ चित्तवृत्ति का निरोध करते हैं :--- "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" (योगदर्शन १/२) संकलनकर्त्ता :---- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री
प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति ये पञ्चविध वृत्तियां ("प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः पञ्च वृत्तयः" योगदर्शन १/६) जब अभ्यास एवं वैराग्य आदि ("अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः" योगदर्शन १/१२ साधनों के द्वारा निरुद्ध हो जाती है और आत्मा अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाता है तब योग होता है :---"तथा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्" (योगदर्शन १/३) संकलनकर्त्ता :---- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री
महर्षि व्यास योग का अर्थ समाधि करते हैं :---"योगः समाधिः" (योगदर्शन, व्यासभाष्य १/१) व्याकरणशास्त्र में युज् धातु से भाव अर्थ में घञ् प्रत्यय करने पर योग शब्द व्युत्त्पन्न होता है । महर्षि पाणिनि के धातुपाठ के दिवादिगण में युज समाधौ, रुधादिगण में युजिर् योगे तथा चुरादिगण में युज संयमने इस रूप में युज् धातु आती है । संक्षेप में हम कह सकते हैं कि संयम पूर्वक साधना करते हुए आत्मा का परमात्मा के साथ योग (संयोग) कर समाधि का आनंद लेना ही योग है । संकलनकर्त्ता :---- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री
आत्मा जब परमात्मा की उपासना करता है तो भगवान के दिव्य ज्ञान, दिव्य प्रेरणा, दिव्य सामर्थ्य, दिव्य सुख, शांति एवं दिव्य आनंद से युक्त हो जाता है । भगवान की दिव्यता से जुड़ना ही योग है । संकलनकर्त्ता :---- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री
उपर्युक्त ऋषियों की मान्यताओं के अनुसार योग का तात्पर्य स्वचेतना और पराचेतना के मुख्य केंद्र परम चैतन्य प्रभु के साथ संयुक्त हो जाना है । सम्यक् बोध से रागोपहति होने पर जब व्यक्ति वैराग्य ("ज्ञानस्यैव पराकाष्ठा वैराग्यम्" योगदर्शन, व्यासभाष्य १/१६) के भाव से अभिभूत हो जाता है, तब वह समस्त क्षणिक भावों, वृत्तियों से ऊपर उठकर आत्मसत्ता के संपर्क में आता है । चित्त की पांच अवस्थाएं हैं :--- "क्षिप्तं मूढं विक्षिप्तमेकाग्रं निरुद्धमिति चित्तभूमयः" (योगदर्शन, व्यासभाष्य १/१) । इनमें से प्रथम तीन अवस्थाओं में योग एवं समाधि नहीं होती । एकाग्र और निरुद्ध अवस्थाओं में अविद्यादि ("अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः") पांच क्लेशों एवं कर्म के बंधन के शिथिल होने पर सम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति होती है । संकलनकर्त्ता :---- योगाचार्य डॉक्टर प्रवीण कुमार शास्त्री
गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण योग को विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त करते हैं । अनुकूलता-प्रतिकूलता, सिद्धि-असिद्धि, सफलता-विफलता, जय-पराजय, लाभ-हानि, सुख-दुःख इन समस्त भागों में आत्मस्थ रहते हुए सम रहने को योग कहते हैं :---"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जयः । सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।।" (गीता २/४८) । असंगभाव से द्रष्टा बनकर अंतर की दिव्य प्रेरणा से प्रेरित होकर कुशलतापूर्वक कर्म करना ही योग है :---"योगः कर्मसु कौशलम्" (गीता २/५०)
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