एसीडिटी का समाधान
एसिडिटी की चिकित्सा
++++++++++++++++
बार-बार खट्टी डकार आना, जी मिचलाना, आफारा होना, पेट फूलना, पेट में गैस होना । यह सारी समस्याएं व्यक्ति को व्यथित करती हैं । पीड़ित करती हैं । दुखी करती हैं । इनसे बचने का उपाय यहां पर हम आपको दिखा रहे हैं ।
इन कारणों से होती है एसिडिटी की समस्या :--
* खान पान पर ध्यान न देने से
* बाजारी, तीखे व चटपटे खाने के कारण
* नशे व धूम्रपान के कारण
* वक़्त पर खाना न खाने से
* खाली पेट चाय पीने से
* चाय कॉफ़ी का अधिक सेवन करने से
* शरीर में गर्मी का अधिक होना भी एसिडिटी का कारण बन सकता है।
आयुर्वेदिक नुस्खे :
पहला प्रयोगः प्रातः काल शौच क्रिया से निवृत्त होने के बाद एक लीटर कुनकुने पानी में 8-10 ग्राम सेंधा नमक डालकर पंजे के बल उकडुॅ बैठकर जल्दी-जल्दी पी जायें। फिर खड़े होकर कमर के बल झुक कर मुँह में उँगली डालकर वमन कर दें। इस क्रिया को गजकरणी कहते हैं। सप्ताह में एक बार करने से अम्लपित्त सदा के लिए मिट जाता है
दूसरा प्रयोगः आँवले का मुरब्बा खाने अथवा आँवले का शर्बत पीने से अथवा द्राक्षा (किसमिस), हरड़े और मिश्री के सेवन से अम्लपित्त में लाभ होता है।
तीसरा प्रयोगः 1-1 ग्राम नींबू के फूल एवं काला नमक को 10 ग्राम अदरक के रस में पीने से अथवा पानी नींबू के शर्बत में लेने से लाभ होता है।
चौथा प्रयोगः सुबह 5 से 10 तुलसी के पत्ते एवं दोपहर को ककड़ी खाना तथा रात्रि में 2 से 5 ग्राम त्रिफला का सेवन करना एसिडिटी के मरीजों के लिए वरदान है।
पाँचवाँ प्रयोगः अम्लपित्त के प्रकोप से ज्वर होता है। इसमें एकाध उपवास रखकर पित्तपापड़ा, नागरमोथ, चंदन, खस, सोंठ डालकर उबालकर ठंडा किया गया पानी पीने से एवं पैरों के तलुओं में घी की मालिश करने से लाभ होता है। ज्वर उतर जाने पर ऊपर की औषधियों में गुडुच, काली द्राक्षा एवं त्रिफला मिलाकर उसका काढ़ा बनाकर पीना चाहिए।
छठा प्रयोगः करेले के पत्तों के रस का सेवन करने से पित्तनाश होता है। वमन, विरेचन व पित्त के प्रकोप में इसके पत्तों के रस में सेंधा नमक मिलाकर देने से फायदा होता है।
सातवाँ प्रयोगः जिनको पित्त-विकार हो उन्हें महासुदर्शन चूर्ण, नीम पर चढी हुई गुडुच, नीम की अंतरछाल जैसी कड़वी एवं कसैली चीजों का सेवन करने से लाभ होता है। गुडुच का मिश्री के साथ सेवन करने से भी लाभ होता है।
आठवाँ प्रयोगः पित्त की उल्टी होने पर एक गिलास गन्ने के रस में दो चम्मच शहद मिलाकर पिलाने से लाभ होता है। अजीर्ण में यह प्रयोग न करें।
नौवाँ प्रयोगः ताजे अनार के दानों का रस निकालकर उसमें मिश्री डालकर पीने से हर प्रकार का पित्तप्रकोप शांत होता है।
दसवाँ प्रयोगः खाली पेट ठण्डा दूध या अरण्डी का 2 से 10 मि.ली. तेल 100 से 200 मि.ली. गाय के दूध में मिलाकर या मीठी छाछ में मिश्री डालकर पीने से पित्तप्रकोप शांत होता है।
ग्यारहवाँ प्रयोगः नीम के पत्तों का 20 से 50 मि.ली. रस 5 से 20 ग्राम मिश्री मिलाकर सात दिन पीने से गर्मी मिटती है
अन्य घरेलु उपचार :
1. मुलैठी के चूर्ण का सेवन करने से गले में जलन और एसिडिटी की परेशानी से राहत मिलती है। मुलहठी का काढ़ा बनाकर सेवन करने से यह और भी असरदार साबित होता है।
2. अशवगंधा का इस्तेमाल एसिडिटी में रामबाण आयुर्वेदिक नुस्खा है। एक गिलास दूध में अशवगंधा मिला कर लेने से एसिडिटी में आराम मिलता है।
3. रात को एक गिलास पानी में नीम की छाल को भिगोकर रख दे और सुबह इस पानी को छानकर इसका सेवन करे या नीम की छाल का चूर्ण बनाकर प्रयोग करे।
4. मुनक्का भी एसिडिटी के उपचार में कामयाब तरीका है। इसे एक गिलास दूध में उबाल ले और दूध पिए या फिर दूध के साथ सेवन करे।
5. पांच से सात गिलोय के छोटे-छटेटु कड़े ले और उन्हें साफ पानी से अच्छी तरह से धो ले साफ कर ले उसके बाद उसे पानी में उबाल ले, फिर गुनगुना होने पर आराम से घूट-घूट कर पीएं ।
जब एसीडिटी खत्म हो जाए तो खानपान में सावधानी रखें । नमकीन, चटपटे भोजन, भुने हुए चने इत्यादि ना खाएं । खाने में अधिक से अधिक फल, सलाद ले । खाने से 10 मिनट पहले सलाद खा ले । बिना नमक के खाते हैं तो अच्छी बात है । यदि नमक के बिना नहीं खाया जाता है तो नमक अलग रखकर के उसमें डूबो डुबोकर खा सकते हैं । सावधानी रखें नमक ज्यादा ना खाएं । कच्चा खाए, अंकुरित चना खाए । शाम को चना मूंग मेथी भिगो दें और सुबह इसे खाएं । अंकुरित करके खाएं । इससे एसिडिटी में लाभ होता है ।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें