योगो भवति दुःखहा

"युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।।"
(गीता)

जिस व्यक्ति का आहार विहार ठीक है, जिस व्यक्ति की सांसारिक कार्यो के करने की निश्चित दिनचर्या है और जिस व्यक्ति के सोने-जागने का समय भी निश्चित है, ऐसा व्यक्ति ही योग कर सकता है तथा उसका योगानुष्ठान दुःखों का नाशक बनता है, अन्यों का नहीं ।

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